जन्माष्टमी पर जानें श्री कृष्ण से जुड़े 11अनोखे और अनजाने रहस्य

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कई हजारों साल से जुड़ी कृष्ण जी की कथाएं कितनी सच है, कितनी काल्पनिक ये प्रश्न हर किसी के मन में उठता है। पर सत्यार्थ की ओर झांककर देखें तो द्वारका में मिले अवशेष हर बड़े बूढ़ों की कहानी की सच्चाई को बयां करते नजर आ रहे है। जिसे वैज्ञानिक भी अपने किए गए शोधों से इस तथ्यों को झुठलाने में असमर्थ रहें है। आज हम कुछ ऐसी ही कृष्ण से जुड़ी उन बातों को बता रहे हैं जिसके बारें से आप आज भी अनजान हैं, तो जानें उन अनजानी बातों के छिपे रहस्यों को….

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कृष्ण जन्म :
पौराणिक कथाओं के अनुसार द्वापर में श्रीकृष्ण जी का जन्म देवकी के गर्भ से आठवें पुत्र के रूप में मथुरा के कारागार में हुआ था। उनका जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के सातवें मुहूर्त के बीत जाने के बाद आठवें मुहूर्त में रात 12 बजे हुआ था। कृष्ण के जन्म के समय हर तरह से आठ के ही संयोग बन रहे थे जो अपने आप में एक रहस्य था। इसे के चलते ये आठ अंक उनके जीवन में गहरा असर डाले हुए था। संयोग भी देखिये कृष्ण की पत्नियां भी आठ ही थी।

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किस रंग के थे श्रीकृष्ण? :
श्रीकृष्ण की छवि को देखकर सभी लोग अपनी अपनी बाते कहते है कोई कहता है कि वो काले थें, तो कोई कहता है कि वो सावलें रंग पर थे। कुछ लोग श्रीकृष्ण को काले रंग तो कुछ लोग श्याम रंग का बताते हैं। श्याम रंग अर्थात कुछ-कुछ काला और कुछ-कुछ नीला। मतलब काले जैसा नीला। जैसा सूर्यास्त के बाद जब दिन अस्त होने वाला समय रहता है तो आसमान का रंग काले जैसा नीला हो जाता है। लेकिन जानकारो का मानना है श्रीकृष्ण का रंग न तो काला था,और ना उनकी त्वचा का रंग मेघ श्यामल के समान मिश्रित रूप था। यह तो सफेद, काला और नीला तीनों रंगों का एक मिश्रित रूप है, क्यों है ना हैरान करने वाली बात।

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श्रीकृष्ण के शरीर की गंध:
कहा जाता है कि श्रीकृष्ण के शरीर से एक तरह की मादक गंध निकलती रहती थी। इस गंध को वे अपने गुप्त रहस्यों में छिपा कर रखने की शक्ति भी रखते थें। ऐसी ही गंध द्रौपदी के शरीर में भी देखने को मिलती थी। द्रौपदी के शरीर से निकलने वाली सुगंध चारों ओर फैलकर लोगों को उनकी ओर आकर्षित करती थी। सभी लोग इस सुगंध को सूघंते हुए उस दीशा की ओर चलने लगते थे। इसीलिए अज्ञातवास काटने के समय द्रौपदी ने अपने शरीर की सुंगध को छिपाने के लिये चंदन, उबटन और सुंगधित इत्र का उपयोग किया था। जिसके कारण उनको सैरंध्री नाम से भी जाना जाता था। श्रीकृष्‍ण के शरीर से निकलने वाली गंध रातरानी और चंदन की सुगंध से कुछ मिलती जुलती थी।

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श्रीकृष्ण की देह लड़कियों के समान मृदु थी:
कोमल और सुंदर अंग वाले भगवान श्रीकृष्ण की देह लड़कियों के समान मृदु थी पर युद्ध के दौरान उनका शरीर अलग तरह का कठोर हो जाता था। वो अपने शरीर को योगा के द्वारा हर तरह के बनाये रखने की योग्यता रखते थें। श्रीकृष्ण कलारिपट्टू और योग विद्या में पारंगत थे जो आज के समय में यह विद्या हर जगह प्रचलित भी है। इसी तरह की काया कर्ण और द्रोपती में भी देखने को मिलती थी।

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श्रीकृष्ण की देह हमेशा जवान थी:
भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था। उनका बचपन वृंदावन, नंदगाव, गोकुल, बरसाना आदि जगहों पर बीता। द्वारिका को उन्होंने अपना निजी स्थान बनाया तो सोमनाथ के पास स्थित प्रभास क्षेत्र में उन्होंने अपने प्राण त्यागे। बताया जाता है कि अपने कुल के नाश से व्यथित हो एक दिन वो एक पीपल के वृक्ष के नीचे अराम कर रहे थे तभी ‘जरा’ नाम के एक बहेलिए ने बना किसी कारण जाने उन्हें हिरण समझकर विषयुक्त बाण चला दिया, वह तीर सीधे जाकर उनके पैर के तलवे को भेद गया, और तभी उन्होंने अपने प्राण को त्यागने का निर्णय ले लिया।

पर आपको यह बात जानकर आश्चर्य होगा कि जब उन्होंने अपने प्राणों को त्याग किया तब उनकी उम्र 119 वर्ष की थी और इस उम्र के समय भी उनकी देह के केश न तो सफेद हुये थे और ना ही उनके शरीर पर किसी प्रकार की झुर्रियां पड़ी थी। वो चिंरजीवी थे।

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कृष्ण की नगरी द्वारका का रहस्य क्या है:
द्वारिका की बात करें तो भगवान कृष्ण की इस सुंदर नगरी का निर्माण गुजरात के समुद्री तट पर अपने पूर्वजों की भूमि पर कराया था जो कई सालों से उजड़ी हुई पड़ी थी। श्रीकृष्ण की इस नगरी को विश्‍वकर्मा और मयदानव के द्वारा निर्मित किया गया था। यही पर रहकर कृष्ण जी ने 8 स्त्रियों से विवाह कर अपना सुखपूर्वक जीवन बिताया। द्वारिका पूरी वैकुंठ के समान थी और यही पर उन्होनें एक नए कुल और साम्राज्य की स्थापना की। कहां जाता है कि कृष्ण की 108 पत्नियां थी पर ये बात गलत है कृष्ण की केवल 8 ही पत्नियां थीं, रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, मित्रवन्दा, सत्या, लक्ष्मणा, भद्रा और कालिंदी। जिनसे उन्हें कई पुत्र और पुत्रियों की प्राप्ति हुई।

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कृष्ण की प्रेमिकाये एवं पत्नियां:
कहा जाता है कि श्रीकृष्ण अपनी रासलीला अपनी प्रेमिकाओं के साथ ही किया करते थें। जिनमें से उनकी प्रिय राधा, ललिता खास प्रेमिकाओं में से थीं। राधा के अलावा कुछ और भी सखियां थी जो कृष्ण से बेहद प्रेम करती थीं जिनके नाम हैं- राधा, ललिता, सुदेवी, चित्रा, चम्पकलता, विशाखा, इन्दुलेखा, तुंगविद्या, और रग्डदेवी। जिनमें से ललिता नाम की प्रेमिका को मोक्ष ना मिल पाने के कारण उन्होनें अगला जन्म मीरा के नाम से लिया था।

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कैसे उजड़ी कृष्ण की द्वारिका:
देवताओं के इंजीनियर विश्वकर्मा जी के द्वारा निर्मित की गई इस नगरी को किसने उजाड़ा यह आज तक की सबसे रहस्यमसी बात है, इसके विषय में कोई भी जान नहीं पाया है पर यह बात ज्ञात ही कि द्वारिका जल में समाने से पहले नष्ट की गई थी। पर इसे किसने नष्ट किया था यह अभी भी अज्ञात है। समुंद्र के अंदर मिले द्वारिका के कुछ अवशेषों के साथ उस समय के बर्तन 1528 ईसा पूर्व से लेकर 3000 ईसा पूर्व के इतिहास का गवाह बने हुए है जो उसी काल के बताये गये है।

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ईसामसीह और श्रीकृष्ण एक थें:
श्रीकृष्ण का ईसा मसीह के जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। उनके जन्म की कथा भी श्रीकृष्ण के जन्म की कथा से कुछ-कुछ मिलती जुलती है। 1869 ई. में रचित एक पुस्तक ‘द बाइबिल इन इंडिया’ में बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण और जीसस क्रिस्ट दोनों ही एक थे।

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मार्शल आर्ट के जनक थे श्रीकृष्ण:
कालारिपयट्टू विद्या जिसके जन्मदाता श्रीकृष्ण को ही माना जाता है। जो आज चीन, जापान आदि जैसे देशों में खूब फल-फूल रही है। बताया जाता है कि श्रीकृष्ण ने अपनी नारायणी सेना को मजबूत करने के लिए उन्होंने इस विद्या का सहारा लिया था। इस कला के चलते ‘नारायणी सेना’ भारत की सबसे खतरनाक सेना बन गई थी।

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शिव और श्रीकृष्ण का जीवाणु युद्ध :
बताया जाता है कि इस काल में सबसे भंयकर युद्ध हुआ था जो जीवाणु युद्ध के नाम से जाना जाता है। जिसमें श्रीकृष्ण ने असम में बाणासुर का विरेध करने के लिए भगवान शिव से युद्ध किया। जिस दौरान शिव जी ने ‘माहेश्वर ज्वर’ को छोड़ा और उसके विरोध में श्रीकृष्ण ‘वैष्णव ज्वर’ का उपयोग कर दुनिया का पहला जीवाणु युद्ध’ लड़ा था।

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श्रीकृष्ण का दिल :
श्रीकृष्ण के देह तो त्याग देने बाद बचे हुए यदुवंशी अर्जुन के साथ हस्तिनापुर चले गये और पांडवों के द्वारा कृष्ण के शरीर का दाह-संस्कार कर दिया गया। परंतु आग में विलिन होने के बाद भी उनका दिल (पिंड) जलता रहा जिसे बाद में जल में प्रवाहित कर दिया गया, जो बाद में लट्ठे के रूप मेंम परिवर्तित हो गया। जिसे बाद में राजा इन्द्रद्युम्न, जो भगवान जगन्नाथ के भक्त थे, ने इस लट्ठे उठाकर इसे जगन्नाथ की मूर्ति के अंदर स्थापित कर दिया। जो आज भी यह लट्ठा भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के अंदर विराजित है। हर 12 वर्षो के बाद भले ही जगन्नाथ की मूर्ति बदल दी जाती है, लेकिन वह लट्ठा वहा से नहीं हटाया जाता है।

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